Posts

झूठ औं सच आधे आधे

सरला ने आवाज लगाई मालिक बचाओ। मालिक ने कहा तुम दौड़ कर मेरे पास आओ। मैं उससे छीन कर तुम्हारी इज्जत खुद ले लूगाँ। अच्छे पत्रकार के सामने फिर तुम्हें वापस दे दूगां। और अखबार मे आते ही हम भी चुनाव के लायक हो जाएंगे। इस पंचवर्षी न सही उस पंचवर्षी पक्का विधायक हो जाएंगे। फिर मस्जिद मे अल्ला औं मंदिर में राधे राधे। नेता होने पे बोलेगें झूठ औं सच आधे आधे। सरला ने फिर एक अंधे को आवाज लगाई। आ मुझे बचा ले मेरे प्यारे अंधे भाई। अंधा बचाने को पहुँचा उसका खून हो गया। वहीं अंधा अगले जन्म में कानून हो गया। कानून भी पुरानी चोट कि वजह से सच नहीं कहता। अंधा कानून इसीलिए किसी का हक नहीं कहता। अब वकीलो के भी पता नहीं क्या इरादे-उरादे। कोर्ट पहुचने से पहले ही झूठ औं सच आधे आधे। सरला तीसरी आवाज में खुदा को पुकारा। अंबर से मेघों ने लगा कि थोड़ा स्वीकारा। किन्तु वो आवाज बादल के गरजने की थी। खुदा सुनता है बस ये बात कहने की थी। फिर थक कर सरला खुद नग्न होने लगी। यह देख क्रूर की क्रूरता भी रोने लगी। क्रूर बोला अब हम ही बदल देते है इरादे। झूठ तो झूठ है सच मे भी झूठ औं सच आधे आधे। ...

मेरे गांव आई रोड़(बघेली कविता)

हमरे गांव के सुन लें हाल हर घर मा एक नोकर। रोड़ नहीं रही अब तक मनईं रहे की जोकर।। हम ता तब लडिकबा रहेन का बताई भइआ। अउ घरे मा रही नहीं एकैउ ठे दुइपहिया।। एठ्ठे टुटही रही तै सइकिल ओहिन का हम रपटी। रोड़मा तुहरओ फसी जमीन कहै जे ओका डपटी।। एक जन का फेर रोड़ के अहिमक चढ़ा जुनून। कहिन रोड़ता अंदर आएके मानी भलेहोए फेर खून।। रोड़के नशामा ऊँकुछ गलतकाम तक कीन्हिन। कुछके दीवारका टोरिन कुछन का धमकी दिन्हिन।। युवाटीम जब मिलके उनका घंटनतक समझाइस। सबके सहमत मिलके भइआ रोड़ गांव आपाइस।। रोड़मा काम लागहै भइआ अहिमक खुसीहै छाई। एंह गांव के वासी अब मरतए सरगा पाई।।          "Prinshu Lokesh"

देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो।

देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। हर युवा मे देश के सम्मान की ही बात हो। देश के परिधान को कुछ गीदड़ो ने घेर लिया है। देश के इतिहास को कुछ लीडरों ने लील लिया है। वतन के चमन से ही सिसकिया क्यूं आ रही। है अगर सब साथ तो क्यों  आवाजें आ रही। हर युवा का काम है तलवार सब के हाथ हो। देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। श्वान को कीमा की आदत कभी जाती नहीं। मूर्खों के सामने इबादत काम आती नहीं। देश के यौवन है हम सब हमी से कुछ आश है। क्लींवता का इस धरा से हमीं से ही नाश है। देश के स्वाधिनता मे सदैव आगे माथ हो। देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। व्यर्थ मे मत गवाओ उन पुराने नाम को। सिंह साहब और शेखर जैसे पावन धाम को। उनके यौवन याद है न,हा! भूल कैसे पाओगे। मरते दम तक कह गए अरि अभी टकराओगे। उनकी संग रह न सके अब तो एक साथ हो। देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। मैने गर चाह लिया बरदाई गालिब मीर देगे। साथ सबका मिल गया जो शत्रु का सीना चीर देगे। शत्रु मे दम कहाँ पर्वत जवानी तोड़ती है। मृत्यु से डर कहाँ मयफांस जवानी मोड़ती है। हे जवानों आओ एक हाथ मे सब हाथ हो। देश के क...

दादी की बैक यात्रा

Image
दादी के बैंक खाते मे २००४ रूपये थे और जब ये बात दादी को पता चली तो उन्होंने कई बार अपने बेटे (यानी मेरे पिता जी) से बोली बेटा इन पैसों को चलो निकलवा दो नहीं तो सरकार काट लेगी। पिताजी ने उन्हें समझाया माताजी वो पैसा नहीं कटेगा उसे खाते मे ही रहने दो कभी किसी बुरी परिस्थिति मे काम आऐगे, किन्तु दादी कहा मानने वाली और जब मैं कर्मभूमि से अपने जन्मभूमि आया तो वही पैसा निकलवाने वाली बात दादी ने हमसे की और हमने कहा उसमें ५०० मेरे होगे। दादी शर्त मंजूर। हम तो बस ५०० के लालच मे चल दिया हमें क्या पता ये दादी बैंक कहानी इतनी हास्य और ज्ञान युक्त होगी, फिर हम दादी पोते सड़क पर जाकर आटो रिक्शे पर बैठ कर बैंक की ओर चल दिये।  कुछ मिनटों मे बैँक पहुँचते ही हास्य रस का उगदम होता है। वहा किसी की रखी चेक बुक उठाकर दादी बोली ले लाला ड्रावल भर दे और जब मैं उसे देखा की ये तो किसी चेक बुक है तो उसे मैं बैंक मैनेजर के पास रख कर वहीं पास के काउन्टर से ड्रावल लाया और जब ड्रावल के सारे कालम भर गए तो दादी को अंगूठा लगाने को बोला तो दादी जी बिल्कुल भड़क गई और हस्ताक्षर करने के चक्कर मे ६ ड्रावल नष्ट कर दी...

यही पे डारूं डेरे

यही पे डारूं डेरे **************** मैं विन्ध्य क्षेत्र का वासी हूँ, ब्रज नगरी भी आता हूँ तेरे। देख के तेरे ठाट- बाट को जी करता यही पे डारूं डेरे। कुंठाओं के चक्कर में भटकन से अच्छा होता है। तेरे चरणों की लगा के तकिया जो प्रेम भाव से सोता है।। दे दे अब हमें शरण वो प्यारा हो जावे मेरे वारे न्यारे। देख के तेरे ठाट- बाट को जी करता यही पे डारूं डेरे।। तेरी श्याम वरण की वो पीत झगुलिया भाती है। अंबर मे बिजली की चिग्गार दिखाई देती है। खुद मे मुझे पिछा ले प्यारे हो जाए हम तेरे- मेरे। देख के तेरे ठाट- बाट को जी करता यही पे डारूं डेरे। कभी कभी लिख जाता हूँ तेरा ही वियोग श्रृंगार मे। कभी कभी कह जाता हूँ विसद प्रेम अनुराग मे। नाथ के नाथ नाथ हो प्यारे हम तो केवल है एक चेरे। देख के तेरे ठाट- बाट को जी करता यही पे डारूं डेरे।। भक्ती के बदले कुछ नहीं देना नहीं तो रोजगारी हो जाऊँगा। भक्ती करके मुक्ती लेली तो एक व्यापारी कहलाऊगा। मैं विन्ध्य क्षेत्र का वासी हूँ, ब्रज नगरी भी आता हूँ तेरे। देख के तेरे ठाट- बाट को जी करता यही पे डारूं डेरे। writerlokesh.blogspot....

क्रंदन

Image
चोटों में दर्द प्रणय का है, पर जख्म अभी भी भारी है। ओठों में आश मिलन की है, पलको मे क्रंदन जारी है।। चित्राक्ष कहा यूं जाती हो, छोड़ के मेरी बस्ती को। चित्रांग कही हर न ले ये, तेरी इस भूली हस्ती को।। यादों में तेरे ठिठक उठा था, पर आज अश्रु की धारी है। ओठों में आश मिलन की है, पलको मे क्रंदन जारी है।। दाही का रूप क्यूं धरे प्रिये, ऊपर से अश्क बहार किया। जैसे खुद के बगिया में, माली ही जघन्य प्रहार किया।। चाहत है मेरी दीर्घकाल तक, तुम पर कतरा कतरा वारी है। ओठों में आश मिलन की है, पलको मे क्रंदन जारी है।। जाओ पर यादें ले जाओ, आँखों में कम सूजन हो। खुद की दुआ खुदा से है, चिरआयु तुम्हारा जीवन हो।। फिर ये विछल उठा है मन, कि यार तु कितनी प्यारी है। यादों मे कुछ तो है लिखना, ये अपनी ही जिम्मेदारी है। ओठों में आश मिलन की है, पलको मे क्रंदन जारी है।।

मयकश मे जाना

Image
पलकों मे कैद चांदनी तेरे ओठों मे सुर्ख रवानी है। बिन तेरे मयकश मे जाना ये बेकार जवानी है।।               बिन तेरे मयकश मे..... साथ बैठ के पीते है लहजो पर तेरे जीते है एक एक लहजे नशे मे तेरे प्यार की एक रवानी है।।                बिन तेरे मयकश मे..... मधुरस मे डूबे हाथ तेरे आ चल दे थोड़ा साथ मेरे पता है तुझको मधुशाला मे तु गढ़ती नई कहानी है।।               बिन तेरे मयकश मे..... मधुरस का मैं मधुकर हूँ तेरे तप का भी वर हूँ दे दे अपने हाथ से थोड़ा जिसकी दुनिया दिवानी है।।               बिन तेरे मयकश मे..... मधुर मधुर मीठे बोलो मे तीखें रस जल के घोलो मे आ मिल कर अब पी जाते फिर रचते नई कहानी है।।               बिन तेरे मयकश मे.....