Posts

साहित्य मदिरा

Image
इन घड़ियों को ना व्यर्थ करो वरना मदिरा ना पाओगे। हर शहरों में बंद हो रही बिन मदिरा मर जाओगे। सुमन गंध में खींचे चलो तुम काले औ मतवाले भंवरे। अम्बर में भी प्याला लेकर घूमो बन बादल चितकबरे। लुप्त हो रही है ये मदिरा इन अंग्रेजी चक्कर में जहां खुली मधुशाला पाओ खूब पियो तुम प्यारे भंवरे। एक बार गर झांक लिए तुम घुसे वहीं रह जाओगे। इन घड़ियों को ना व्यर्थ करो वरना मदिरा ना पाओगे।१। अंधकार की निशा मिटा कर प्राची की किरणें लाती है। एक बार जो पान किया याद बनी रह जाती है। तीर चलाओ तुम मदिरा का लक्ष्य जहां है रहने दो एक अनोखा ढंग मदिरा का तीरों को लक्ष्य बुलाती है। बस एक बार हिय में उतरे फिर जन जन तक पहुंचाओगे। इन घड़ियों को ना व्यर्थ करो वरना मदिरा ना पाओगे।२। छूत हीन औ जूठ हीन साहित्य कि पावन मदिरा है। आंसू से निकली है प्रसाद के दिनकर की सावन मदिरा है। रूप हीन औ गंध हीन भाव रूप से भरी हुई तुलसी की राम कथा देखो भाव - भाव में मदिरा है। मेरे लेखनि के स्याही में हर बूंद में मदिरा पाओगे। इन घड़ियों को ना व्यर्थ करो वरना मदिरा ना पाओगे।३। आसमान से झां...

निदाई में पनपा प्यार

Image
*_______________________________________* खेतों में चल रही निदाई कि निगरानी के लिए हमें घर से दोपहर 11 के आस पास बजे खेदा गया आज एक अद्वितीय प्रेमी से भेट होगी हमने यह सोचा भी नहीं । घर से 5 सेर पानी और आधा सेर गुड़ लेकर चला और नदी पार खेतों तक पहुच कर  निंदाई कर रही मजदूरनी को पानी और गुड़ थमाया फिर निंदाई से उखड़े खरपतवार उठा- उठा कर मेड़ पर रखने लगा मेघों कि कृपा विशेष रही उनके रिमझिम करने से काम में थकान नहीं हो रही । लगभग आधे घंटे के बाद कुछ खेतों आगे एक कृष्णवरण का जवान युवक लगभग 7-8 माह के बच्चे को सिर पर बिठाकर कुछ गीत गुनगुनाते हुए सीधे आ रहा । मैने पास निंदाई कर रही औरतों से उसके बार में पुछा तो एक अधेड़ औरत बोली मेरा लडका है और इसका पति(बगल खड़ी औरत को छू कर)। मैं झुक कर अपने काम में बारिश कि बूदें थोड़ी तेजी से और व्यक्ति छाता लगाकर खेत तक अलौकिक प्रेम का दर्शन आरम्भ युवक बच्चे को पुचकारते हुए अपनी औरत को प्यार के बोलता है। 'अले लल्ली कि माँ आओ बेतू को दुध्धू पिला दो' सुनते ही युवती फट से उठी और धान के पौधों को रौदते चल पडी। ओए सभल कर चल कहकर मैं फिर अपने काम मे...

देखो सखी मधुवर्षण हो रही

Image
अंबर में मेघों को देखो लिए हाथ में प्याले हैं। रवि,शशि दोनों दिखते छिपते सब पी कर मतवाले हैं। सभी देव पीकर लड़खाते देखो कैसी गर्जन हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। अंबर में ज्यों लुढ़का प्याला तरु पतिका से मदिरा टपके। वर्षों से आश लगाऐ बैठा प्यासा चातक रस को झपके। उसी रसो में डूबी लतिका हरी भरी आकर्षक हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। रवि के ताप से तपती वसुधा हिमरस पाते प्रमुदित हो गई। तिमिर गेह में पडीं जो बीजें मधुरस पाते हर्षित हो गई। पी कर खड़े हुए नवतरु नशे में डाली चरमर हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। हुआ आगमन निज प्रियतम का एक बूंद अधरों में पड़ गई। कौन प्रियतमा किसकी प्रियतम नशे में जाने क्या-क्या कह गई। नशे में नैन हुए अंगूरी काम में वो तो शंकर हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। रूप अप्सरा चली गई फिर पूर्ण रूप से गलगल हो कर। वसुधा का आंचल फिर देखा दादुर बोले गदगद हो कर। किसी का प्याला चटका नभ पर देखो कैसी लपकन हो रही। देखो सखी मधुवर्षण हो रही। इन मेघों में न जाने कितना मदिरा भरा हुआ है। हिमशिखरों से हिम भी लाते जो मदिरा में ...

झूठ औं सच आधे आधे

सरला ने आवाज लगाई मालिक बचाओ। मालिक ने कहा तुम दौड़ कर मेरे पास आओ। मैं उससे छीन कर तुम्हारी इज्जत खुद ले लूगाँ। अच्छे पत्रकार के सामने फिर तुम्हें वापस दे दूगां। और अखबार मे आते ही हम भी चुनाव के लायक हो जाएंगे। इस पंचवर्षी न सही उस पंचवर्षी पक्का विधायक हो जाएंगे। फिर मस्जिद मे अल्ला औं मंदिर में राधे राधे। नेता होने पे बोलेगें झूठ औं सच आधे आधे। सरला ने फिर एक अंधे को आवाज लगाई। आ मुझे बचा ले मेरे प्यारे अंधे भाई। अंधा बचाने को पहुँचा उसका खून हो गया। वहीं अंधा अगले जन्म में कानून हो गया। कानून भी पुरानी चोट कि वजह से सच नहीं कहता। अंधा कानून इसीलिए किसी का हक नहीं कहता। अब वकीलो के भी पता नहीं क्या इरादे-उरादे। कोर्ट पहुचने से पहले ही झूठ औं सच आधे आधे। सरला तीसरी आवाज में खुदा को पुकारा। अंबर से मेघों ने लगा कि थोड़ा स्वीकारा। किन्तु वो आवाज बादल के गरजने की थी। खुदा सुनता है बस ये बात कहने की थी। फिर थक कर सरला खुद नग्न होने लगी। यह देख क्रूर की क्रूरता भी रोने लगी। क्रूर बोला अब हम ही बदल देते है इरादे। झूठ तो झूठ है सच मे भी झूठ औं सच आधे आधे। ...

मेरे गांव आई रोड़(बघेली कविता)

हमरे गांव के सुन लें हाल हर घर मा एक नोकर। रोड़ नहीं रही अब तक मनईं रहे की जोकर।। हम ता तब लडिकबा रहेन का बताई भइआ। अउ घरे मा रही नहीं एकैउ ठे दुइपहिया।। एठ्ठे टुटही रही तै सइकिल ओहिन का हम रपटी। रोड़मा तुहरओ फसी जमीन कहै जे ओका डपटी।। एक जन का फेर रोड़ के अहिमक चढ़ा जुनून। कहिन रोड़ता अंदर आएके मानी भलेहोए फेर खून।। रोड़के नशामा ऊँकुछ गलतकाम तक कीन्हिन। कुछके दीवारका टोरिन कुछन का धमकी दिन्हिन।। युवाटीम जब मिलके उनका घंटनतक समझाइस। सबके सहमत मिलके भइआ रोड़ गांव आपाइस।। रोड़मा काम लागहै भइआ अहिमक खुसीहै छाई। एंह गांव के वासी अब मरतए सरगा पाई।।          "Prinshu Lokesh"

देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो।

देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। हर युवा मे देश के सम्मान की ही बात हो। देश के परिधान को कुछ गीदड़ो ने घेर लिया है। देश के इतिहास को कुछ लीडरों ने लील लिया है। वतन के चमन से ही सिसकिया क्यूं आ रही। है अगर सब साथ तो क्यों  आवाजें आ रही। हर युवा का काम है तलवार सब के हाथ हो। देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। श्वान को कीमा की आदत कभी जाती नहीं। मूर्खों के सामने इबादत काम आती नहीं। देश के यौवन है हम सब हमी से कुछ आश है। क्लींवता का इस धरा से हमीं से ही नाश है। देश के स्वाधिनता मे सदैव आगे माथ हो। देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। व्यर्थ मे मत गवाओ उन पुराने नाम को। सिंह साहब और शेखर जैसे पावन धाम को। उनके यौवन याद है न,हा! भूल कैसे पाओगे। मरते दम तक कह गए अरि अभी टकराओगे। उनकी संग रह न सके अब तो एक साथ हो। देश के कल्याण मे हर युवा एक साथ हो। मैने गर चाह लिया बरदाई गालिब मीर देगे। साथ सबका मिल गया जो शत्रु का सीना चीर देगे। शत्रु मे दम कहाँ पर्वत जवानी तोड़ती है। मृत्यु से डर कहाँ मयफांस जवानी मोड़ती है। हे जवानों आओ एक हाथ मे सब हाथ हो। देश के क...

दादी की बैक यात्रा

Image
दादी के बैंक खाते मे २००४ रूपये थे और जब ये बात दादी को पता चली तो उन्होंने कई बार अपने बेटे (यानी मेरे पिता जी) से बोली बेटा इन पैसों को चलो निकलवा दो नहीं तो सरकार काट लेगी। पिताजी ने उन्हें समझाया माताजी वो पैसा नहीं कटेगा उसे खाते मे ही रहने दो कभी किसी बुरी परिस्थिति मे काम आऐगे, किन्तु दादी कहा मानने वाली और जब मैं कर्मभूमि से अपने जन्मभूमि आया तो वही पैसा निकलवाने वाली बात दादी ने हमसे की और हमने कहा उसमें ५०० मेरे होगे। दादी शर्त मंजूर। हम तो बस ५०० के लालच मे चल दिया हमें क्या पता ये दादी बैंक कहानी इतनी हास्य और ज्ञान युक्त होगी, फिर हम दादी पोते सड़क पर जाकर आटो रिक्शे पर बैठ कर बैंक की ओर चल दिये।  कुछ मिनटों मे बैँक पहुँचते ही हास्य रस का उगदम होता है। वहा किसी की रखी चेक बुक उठाकर दादी बोली ले लाला ड्रावल भर दे और जब मैं उसे देखा की ये तो किसी चेक बुक है तो उसे मैं बैंक मैनेजर के पास रख कर वहीं पास के काउन्टर से ड्रावल लाया और जब ड्रावल के सारे कालम भर गए तो दादी को अंगूठा लगाने को बोला तो दादी जी बिल्कुल भड़क गई और हस्ताक्षर करने के चक्कर मे ६ ड्रावल नष्ट कर दी...