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मेरे गांव आई रोड़(बघेली कविता)

हमरे गांव के सुन लें हाल हर घर मा एक नोकर। रोड़ नहीं रही अब तक मनईं रहे की जोकर।। हम ता तब लडिकबा रहेन का बताई भइआ। अउ घरे मा रही नहीं एकैउ ठे दुइपहिया।। एठ्ठे टुटही रही तै सइकिल ओहिन का हम रपटी। रोड़मा तुहरओ फसी जमीन कहै जे ओका डपटी।। एक जन का फेर रोड़ के अहिमक चढ़ा जुनून। कहिन रोड़ता अंदर आएके मानी भलेहोए फेर खून।। रोड़के नशामा ऊँकुछ गलतकाम तक कीन्हिन। कुछके दीवारका टोरिन कुछन का धमकी दिन्हिन।। युवाटीम जब मिलके उनका घंटनतक समझाइस। सबके सहमत मिलके भइआ रोड़ गांव आपाइस।। रोड़मा काम लागहै भइआ अहिमक खुसीहै छाई। एंह गांव के वासी अब मरतए सरगा पाई।।          "Prinshu Lokesh"